Contact: +91 844 894 1008
bgwebsite_logo
Bhagavad Gita
The Song of God

Bhagavad Gita: Chapter 7, Verse 1

श्रीभगवानुवाच |
मय्यासक्तमना: पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रय: |
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु || 1||

श्रीभगवान-उवाच-भगवान ने कहा; मयि–मुझमें; आसक्त-मना:-मन को अनुरक्त करने वाला; पार्थ-पृथापुत्र, अर्जुन; योगम्-भक्ति योगः युञ्जन्–अभ्यास करते हुए; आश्रयः-मेरे प्रति समर्पित; असंशयम्-सन्देह से मुक्त; समग्रम्-पूर्णतया; माम्-मुझे; यथा-कैसे; ज्ञास्यसि तुम जान सकते हो; तत्-वह; श्रृणु-सुनो।

Translation

BG 7.1: परम प्रभु ने कहा-हे अर्जुन! अब यह सुनो कि भक्तियोग के अभ्यास द्वारा और मेरी शरण ग्रहण कर मन को केवल मुझमें अनुरक्त कर और संदेह मुक्त होकर तुम मुझे पूर्णतया किस प्रकार जान सकते हो।

Commentary

छठे अध्याय के समापन पर श्रीकृष्ण ने घोषणा की थी कि वे जो मन को केवल उनमें स्थिर कर श्रद्धा भक्ति से उनकी सेवा करते हैं वे सब योगियों में श्रेष्ठ हैं। इस कथन द्वारा मन में कुछ स्वाभाविक प्रश्न उठते हैं कि परमात्मा को जानने का मार्ग क्या है? कोई भगवान का ध्यान कैसे करे? भक्त भगवान की आराधना कैसे करें?

यद्यपि अर्जुन द्वारा ये प्रश्न नहीं किए गए किन्तु अपनी अनुकंपा से भगवान इनका पूर्वानुमान कर उत्तर देना प्रारम्भ करते हैं। उन्होंने 'श्रृणु' शब्द का प्रयोग किया है जिसका अर्थ सुनना है और इसके साथ 'मदाश्रयः' शब्द का भी प्रयोग किया है जिसका अर्थ 'अपने मन को मुझमें केन्द्रित करना' है।

Bookmark this Verse

Sign in to save your favorite verses.

Add a Note
Swami Mukundananda
7. ज्ञान विज्ञान योग

Quick Jump to Any Verse

Navigate directly to the wisdom you seek

Book with feather

Stay Connected!

Verse of the Day

Start your day with the timeless inspiring wisdom from the Holy Bhagavad Gita delivered straight to your email!

Thanks for subscribing to "Bhagavad Gita - Verse of the Day"!